मेवाड़ की तलवार, साहस और सैन्य विजय
सन् 1509 में राणा सांगा का राज्याभिषेक महज़ एक राजा की ताजपोशी तक सिमित नहीं था। यह मेवाड़ी स्वाभिमान में एक तलवार का म्यान से निकलना था, एक ऐसा फलक जो मेवाड़ की अटल भावना की अग्नि में तपाया गया था। कुमार संग्राम सिंह, जो अब समय के साथ महाराणा सांगा कहलाए, जो राजा बनते ही शत्रुओं से घिरे एक राज्य के शिखर पर खड़े थे। उस वक्त मेवाड़ की सीमाएँ एक ऐसी कसौटी पर खड़ी थीं, जहाँ हर दिन सम्मान और अस्तित्व की परीक्षा होती थी। उत्तर में दिल्ली सल्तनत का साया मँडरा रहा था, क्योंकि उस पर बैठे अफगान शासक प्रभुत्व की भूख से भरे जा रहे थे। पश्चिम में गुजरात सल्तनत और दक्षिण में मालवा सल्तनत मेवाड़ के समक्ष अपने दाँत तीखे कर रही थीं, तीनो और से मुघलो की सत्ता राजपूत धरती को निगलने के लिए आतुर खडी थी। फिर भी महाराणा सांगा कोई सामान्य शिकार नहीं थे, जिसे आसानी से थाम लिया जाए। वे एक प्रशिक्षित और सामर्थ्यवान के साथ साथ निर्भय शिकारी थे, एक सिंह की तरह जिनकी दहाड़ से ही उस वक्त साम्राज्यों की नींव हिल जाती थी। तख़्त पर आसीन होते ही अगले दो दशकों में, उन्होंने मेवाड़ को उसकी शक्ति के चरम तक पहुँचाया। उनके सैन्य अभियान पराक्रम, रणकौशल और बलिदान की एक संनाद थे। यह उन युद्धों की गाथा है, जिन्होंने उनके शासन को परिभाषित किया, उन विजयों की, जिन्होंने उनके नाम को भारतीय इतिहास की शिलाओं पर अंकित किया, और उन घावों की, जिन्होंने उन्हें मेवाड़ की अजेय तलवार बनाया।
खतौली की लड़ाई: एक दहाड़ती चुनौती (1517)
सांगा की पहली बड़ी अग्निपरीक्षा सन् 1517 में आई, जब की उनके शासन के आठ वर्ष ही बीते थे। उत्तर से युद्ध की हवाएँ अधिक तेजी से चल रही थीं। दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी ने 1517 में अपने पिता सिकंदर लोदी से एक अस्थिर साम्राज्य विरासत में ले लिया था। अभिमानी और महत्वाकांक्षी इब्राहिम ने राजपूत राज्यों पर अपनी सत्ता थोपने का मन बना लिया लेकिन उसके लिए उन्हें मेवाड़ से लोहा लेना था, क्योंकि राजपूत राजाओ के आगे सांगा खड़े थे। इसलिए इब्राहीम के स्वप्न को देखते हुए उसने मेवाड़ को अपने लिए एक काँटा माना। लेकिन वाही दूसरी और महाराणा सांगा ने दिल्ली के सुल्तान को एक चुनौती के रूप में देखा। उनका सदैव से एक भारत और राजपूताने के एकत्रीकरण का सपना था जो उन्हें इस जंग के माध्यम से सफल होता नजर आ रहा था। एक एकीकृत राजपूताना का सपना, जो विदेशी शासन से मुक्त हो। संघर्ष की चिंगारी हरावती के सीमावर्ती क्षेत्र (जो आज के कोटा के पास था) एक छोटे से विवाद से भड़की। पर यह चिंगारी जल्द ही एक ऐसी ज्वाला में बदल गई, जिसने दोनों योद्धाओं के साहस को जांचा परखा और नांप लिया।
खतौली का युद्ध धूल भरे मैदानों में लड़ा गया, जहाँ अरावली की तलहटी चंबल नदी के हरे-भरे तटों से मिलती थी। सांगा ने राजपूत योद्धाओं की सेना एकत्र की ( जिसमे सिसोदिया, राठौड़ और कछवाहा सामिल थे) जिनके झंडे हज़ारों बाजों के पंखों से लहरा रहे थे। उनकी सेना की संख्या को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, पर अनुमान 20,000 घुड़सवारों और पैदल सैनिकों का है, जिनकी तलवारें दोपहर के सूरज में चमक रही थीं। इब्राहिम लोदी ने अफगान घुड़सवारों और भाड़े के सैनिकों की विशाल सेना लेकर दक्षिण की ओर कूच किया, उसे यह भरोसा था कि उसकी संख्या राजपूत विद्रोह को कुचल देगी। लेकिन उसका अनुमान ओंधे मुह गिर पड़ा। क्योंकि मेवाड़ महाराणा सांगा कोई अनुभवहीन योद्धा नहीं थे, उन्होंने अपनी जवानी को रेगिस्तान के युद्धक्षेत्रों में प्रशिक्षण लेते हुए गुजारा था। उनकी एक आँख युद्ध के मैदान को ऐसे पढ़ती थी, मानो कोई कवि प्राचीन ग्रंथ को पढ़ लेता है।
यह टकराव भयंकर और विनाशक था, मानो लोहे और रक्त का तूफान उमड रहा था। युद्ध में राणा सांगा अपने युद्ध घोड़े पर सवार सबसे आगे थे, उनकी आवाज़ वज्र सी गूँजती थी, जो उनके सैनिकों को आत्मविश्वास से भरते हुए एकजुट करती थी। राजपूत घुड़सवारों ने हवा के बवंडर की गति से धावा बोला, उनके भाले लोदी की शैन्य पंक्तियों को चीरते हुए आरपार निकल रहे थे। हालाँकि सुल्तान की सेना बड़ी थी, पर उसमें तालमेल की कमी थी। लगातार हमलों ने उनकी पंक्तियों को तोड़ दिया और हिम्मत को भी। युद्ध के बीच राणा सांगा को भारी कीमत चुकानी पड़ी। एक अफगान तलवार ने उनका बायाँ हाथ काट दिया, रक्त उनकी नीचे की रेत को भिगो गया। कुछ ही पल बाद, एक तीर उनके पैर में लगा, जिसने उन्हें जीवन भर के लिए लँगड़ा कर दिया। दर्द उनकी देह को जला रहा था, पर उनकी आत्मा अडिग थी। काठी पर झुककर वे लड़ते रहे, एक हाथ से तलवार चलाते हुए, उनकी चीत्कार उनके सैनिकों को आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही थी।
हमला रुका नहीं और फिर पलटवार हुआ। लेकिन घायल राणा को युद्धदेव सा लड़ते देख लोदी सेना का हौसला टूट गया। उनकी शैन्य पंक्तियाँ निरंतर बिखर गईं। लोदी वंश का एक राजकुमार (कुछ कहते हैं, इब्राहिम का भाई जलाल खान) पकड़ा गया, उसका शाही रक्त सांगा की विजय का पुरस्कार बना। सुल्तान शैन्य के भाग उठते ही उत्तर की ओर भागा, राजपूतों को झुकाने का उसका सपना इस युद्ध में चूर-चूर हो गया। खतौली केवल सैन्य जीत नहीं थी, यह एक उद्घोषणा थी की ‘मेवाड़ दिल्ली के सामने नहीं झुकेगा’। इसी जित के साथ राणा सांगा, भले ही अपंग हो गए हों, लेकिन राजपूताने के लिए एक महावीर योद्धा बनकर उभरे। युद्ध की जित के साथ ही चंबल तट की भूमि मेवाड़ के अधीन हो गई और इब्राहिम लोदी की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई। सांगा के लिए यह व्यक्तिगत कीमत थी, क्योंकि जित के बाद भी उनके शरीर पर विद्रोह के निशान अंकित थे, राजपूत संकल्प का प्रमाण कि वीरता जीवित रहने से बढ़कर है।
धौलपुर: दूसरा प्रहार (1518-19)
खतौली की हार से आहत इब्राहिम लोदी ने अपने घाव चाटे और अपने अभिमान को सहलाया। उसने हार का सामना तो किया, लेकिन जित की चाह उसके मन में अपमान का बदला बनकर जिवंत हो उठी। वह राणा सांगा की धृष्टता को बर्दाश्त नहीं कर सकता था, क्योंकि मेवाड़ की बढ़ती ताकत उसकी सल्तनत को खतरे में डाल रही थी, जो पहले ही विद्रोही सरदारों से कमज़ोर हो चुकी थी। 1518 में, या शायद 1519 की शुरुआत में, उसने नई सेना जुटाई और फिर दक्षिण की ओर कूच किया। इस बार उसने धौलपुर को निशाना बनाया (आगरा के निकट एक रणनीतिक किला) जो दिल्ली के हृदय का द्वार था। हमेशा सजग रहेते हुए राणा सांगा ने खोई प्रतिष्ठा हासिल करने और मेवाड़ के प्रभुत्व को कुचलने की लोदी द्वारा की जाने वाली कोशिश को सही से समझा । वे सुल्तान के पहले हमले का इंतज़ार भी नहीं करना चाहते थे।
महाराणा सांगा ने रेगिस्तानी हवा सी तेज़ी से अपनी सेनाएँ एकत्र करना प्रारंभ किया जिन्होंने खतौली की जीत का स्वाद चखा था। इस सेना में मारवाड़ के राव गंगा, वागड़ के रावल उदय सिंह और छोटे सरदारों को भी बुलाया गया। उनकी सेना इस बार शायद 30,000 तक पहुँच गई, जो निष्ठा और गौरव के सूत्र से बँधी हुई थी। धौलपुर का उबड़-खाबड़ इलाका रक्षकों के पक्ष में था, पर सांगा ने इसे अपने हित में मोड़ दिया। उन्होंने घुड़सवारों को मैदानों में, तीरंदाज़ों को पहाड़ियों पर और पैदल सेना को किले के द्वारों पर तैनात किया। इस तरह सांगा द्वारा रचित एक लौह जाल, जो लोदी सेना को फँसाने के लिए तैयार था। सुल्तान इस बार राणा सांगा से दुगुनी सेना लेकर आया, उसके झंडे खतौली की शर्मिंदगी को मिटाने की हुंकार भर रहे थे। मगर युद्ध केवल संख्याओं से नहीं जीते जाते, रणनीति और हौसला भी इसमें अहम् भूमिका निभाता है और विजय दिलाता है।
युद्ध भोर में शुरू हुआ, हवा धूल से भरी, योद्धाओं की चीखों से गूँजती रही।राणा सांगा खतौली युद्ध के बाद अब एक हाथ और पैर से लँगड़े होते हुए अपनी घुड़सवार सेना के आगे चल रहे थे, युद्ध में उनकी उपस्थिति एक शंखनाद की तरह थी। राजपूतों ने पहला वार किया, उनके घुड़सवार लोदी की अग्रिम पंक्ति पर ज्वार से टूट पड़े। अफगान पंक्तियाँ डगमगाईं, फिर संभलीं, उनके भाले एक दीवार बन गए। सांगा ने जवाबी रणनीति अपनाई और उनके तीरंदाज़ों ने ऊँचाइयों से तीरों की बौछार शुरू कर दी जिसने देखते ही देखते दुश्मन की पंक्तियों को छलनी कर दिया, तिरो से बचने की कोशिश में उन्हें वह रणनीति समझ नहीं आई जहा पैदल सेना दक्षिण से आगे बढ़ी जा रही थी। इब्राहिम ने अपनी घुड़सवार सेना से पलटवार किया, पर राजपूत संकल्प के आगे वह लड़खड़ा गया। घंटों तक रक्तरंजित गतिरोध चला, धरती खून से तर और हवा मृत्यु की गंध से भारी होती जा रही थी।
फिर वह निर्णायक मोड़ आया, जिसका इंतजार शायद राणा को था। लोदी के गठन में एक दरार को देख कर सांगा ने उसी को निशाना बनाते हुए साहसिक हमला बोला। उनका घोड़ा गिरे शत्रुओं पर उछल रहा था, उनकी तलवार प्रतिशोध की धुंध बन गई। उनके सैनिक पीछे-पीछे दौड़े, क्रोध की लहर ने अफगान केंद्र को चूर कर दिया। इब्राहिम की सेना बिखर गई, उनकी वापसी भी एकबार फिर से हार में बदल गई। सुल्तान फिर भागा वह भी अपना गौरव और क्षेत्र का हिस्सा मेवाड़ के लिए छोड़कर। अब धौलपुर भी राणा सांगा के कब्ज़े में आया, यह किला एक पुरस्कार था, जिसने मेवाड़ की सीमाओं को आगरा के करीब तक ला दिया था। इस विजय ने सांगा को सुल्तानों का संकट बना दिया था। अब सांगा के लिए कहा गया की ‘सांगा – एक ऐसा राजा, जो दिल्ली के सबसे शक्तिशाली शासकों को भी धूल चटा सकता था’। राणा के एक के बाद एक दिए हार के घांव से इब्राहिम लोदी कभी नहीं उबरा। उसका शासन धीरे-धीरे ढहता गया, उसके सरदार कमज़ोरी की बातें करते रहे, उसका सिंहासन खोखला हो गया।
गागरोन: मालवा पर विजय (1519)
दिल्ली के कमज़ोर पड़ने के साथ सांगा ने अपनी नज़र दक्षिण की ओर मालवा सल्तनत पर डाली। निरंतर युद्ध और शरीर में लगे गंभीर घांव के बाद भी राणा ने शांत बैठना स्वीकार नहीं किया। वह अब मालवा जितना चाहते थे, एक ऐसी भूमि जो व्यापार से समृद्ध और उथल-पुथल से भरी थी। इसका शासक महमूद खिलजी द्वितीय अब अपने राजपूत वज़ीर मेदिनी राय की कठपुतली बन चुका था। चंदेरी का यह सरदार सुल्तान से नियंत्रण छीन चुका था। मेदिनी राय जो एक हिंदू योद्धा था, उसने खिलजी के वफादारों के खिलाफ अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए राणा सांगा से मदद माँगी और बदले में निष्ठा का वादा किया। सांगा ने इसमें अवसर देखा, न केवल सहयोगी की सहायता करना, बल्कि मेवाड़ का प्रभुत्व बढ़ाने और एक और मुस्लिम सल्तनत पर प्रहार करने का। 1519 में, उन्होंने मालवा पर चढ़ाई की उस वक्त उनकी सेना 40,000 की थी, जो राय की टुकड़ियों और लूट के वादे से बढ़ी थी।
गागरोन की लड़ाई गागरोन किले के पास लड़ी गई। गागरोन एक पहाड़ी पर बसा गढ़, जहाँ काली सिंध और आहू नदियाँ मिलती हैं लेकिन इसकी दीवारें अभेद्य थीं। अपना सिंहासन वापस पाने को बेताब महमूद खिलजी ने तुर्कों, अफगानों और स्थानीय सैनिकों की सेना जुटाई, जिसे तोपों ने और अधिक मज़बूत किया था। तोप राजपूत युद्ध में एक दुर्लभ हथियार मानी जाती थी। लेकिन राणा सांगा सतर्कता से आगे बढ़े, उनका मन एक योजना बुन रहा था और उनके टोह लेने वाले इलाके का नक्शा बना रहे थे। किले की प्राकृतिक रक्षा दुश्मन के पक्ष में थी, पर सांगा की प्रतिभा बाधाओं को अवसर में बदलने में अधिक कुशल थी। उन्होंने अपनी सेना को बाँटा, जिस योजना के अनुसार मैदानों में घुड़सवार, नदी किनारों पर पैदल सेना, और पीछे से हमले के लिए राय के अधीन एक रिज़र्व सेना को रखा गया।
युद्ध तोपों की गड़गड़ाहट से शुरू हुआ, उनकी गर्जना से धरती काँप उठी। इन हथियारों से अपरिचित राजपूत क्षण भर डगमगाए, पर राणा सांगा की हुंकार ने अराजकता को दोबारा चीर दिया: “कायरों की गड़गड़ाहट से मत डरो – हमारी तलवारें उसे शांत करेंगी!” उनके सैनिक एकजुट हुए, उनका साहस फिर जागा। घुड़सवारों ने तोपों से बचते हुए हमला बोला, उनके भाले खिलजी की पंक्तियों को चीरते हुए आगे बढ़ते चले गए। पैदल सेना नदियाँ पार कर आगे बढ़ी, उनकी ढालें उन्हें दुश्मन तीरों से बचाती रहीं, जबकि राय की टुकड़ी पहाड़ियों से निकली – राणा सांगा की निहाई पर हथौड़े-सी। सुल्तान की सेना दबाव में फँस गई, उसने डटकर मुकाबला तो किया पर हमले को झेल न सकी। महमूद स्वयं पकड़ा गया, उसका शाही तंबू उजड़ गया, उसके पुनरुत्थान के सपने भी अब चकनाचूर हो गए।
गागरोन में राणा सांगा की जीत एक विजय स्तंभ की भांति थी। उन्होंने युद्ध विजय के साथ ही मालवा के अधिकांश हिस्से पर कब्ज़ा किया और मेदिनी राय को वहाँ का जागीरदार बनाया। लेकिन उनकी उदारता जो की उनकी वीरता जितनी ही प्रसिद्ध थी वह और अधिक चमक उठी। महमूद खिलजी को मारने के बजाय उन्होंने उसके साथ सम्मान सह व्यवहार किया, उसे एक राजा की भांति सह सन्मान बंधकों की सुरक्षा और शांति के वादे के बाद रिहा कर दिया। यह सांगा की कमज़ोरी नहीं थी, किन्तु यह एक संदेश था की: सांगा विनाश के लिए नहीं, प्रभुत्व के लिए लड़ते थे। मालवा की संपदा जैसे की अनाज, व्यापार मार्ग और व्यापर अब मेवाड़ में बहने लगे, जो उनके बढ़ते साम्राज्य को बल दे रहे थे। कवियों ने गागरोन को धर्म की विजय कहा, क्योंकि एक हिंदू राजा ने सदी की हार के बाद उस खोई धरती को वापस लीया था।
इडर और गुजरात: पश्चिम का तूफान (1520)
मालवा की विजय के बाद सन् 1520 में राणा सांगा पश्चिम की ओर बढ़े। इडर की उबड़-खाबड़ पहाड़ियों और गुजरात के उपजाऊ मैदानों तक उनकी नजर कुछ खोज रही थी। मुज़फ्फर शाह द्वितीय के अधीन गुजरात सल्तनत, दिल्ली को टक्कर देने वाली शक्ति थी। इसकी अधिकतर संपत्ति समुद्री व्यापार से आती थी, इसकी सेना मुस्लिम कुलीनों और हिंदू जागीरदारों का मिश्रण थी। शायद जिस चिंगारी की खोज उन्हें थी वह चिंगारी भी इडर से ही भड़की। एक छोटा राजपूत राज्य, जहाँ उत्तराधिकार विवाद में गुजरात सल्तनत ने दखल दिया। वैध शासक राव रायमल ने गुजराती गवर्नर निज़ाम-उल-मुल्क के खिलाफ राणा सांगा की शरण माँगी, जिसने एक प्रतिद्वंद्वी का समर्थन किया था। राजपूत सम्मान के रक्षक सांगा ने एक और सल्तनत को नीचा दिखाने और मेवाड़ के पश्चिम को सुरक्षित करने का अवसर इस अरज में देखा।
उन्होंने 40,000 सैनिकों का गठबंधन लेकर गुजरात की और कूच करना प्रारंभ किया। सिसोदिया, राठौड़, और डूंगरपुर व बांसवाड़ा के सरदार उस सेना में सामिल थे, उनके झंडे राजपूत गौरव का ताना-बाना बुनते हुए आगे बढ़ रहे थे। अभियान इडर से शुरू हुआ, जहाँ सांगा ने निज़ाम की सेना को तीखे, रक्तरंजित संघर्ष में हराया और रायमल को उसकी गद्दी पर बिठाया। लेकिन वे वाही पर रुके नहीं। साहस जुटाकर, उन्होंने गुजरात में भी प्रवेश किया, उनकी सेना तूफान-सी फैल गई। लेकिन अहमदाबाद के पास मुज़फ्फर शाह ने विशाल सेना से उनका मुकाबला किया। उस सेना में घुड़सवार, पैदल सैनिक और युद्ध हाथी, जिनकी तुरहियाँ राजपूत सींगों को चुनौती दे रही थीं। युद्ध एक प्रलय था—धूल इतनी घनी कि सूरज ढक गया, मनुष्य और पशु की चीखें कोलाहल बन गईं।
सांगा की रणनीति इस बार भी अथक थी। उनकी घुड़सवार सेना ने गुजराती किनारों को भेदा, तीरंदाज़ों ने हाथी सवारों को निशाना बनाया, और पैदल सेना ने केंद्र को लोहे की दीवार सा थामे रखा। तीरों से पागल हाथी अपनी ही पंक्तियों पर पलटे, इस मुसीबत को शाह की सेना सह न पाई और युद्ध की इच्छा अराजकता बनकर फैल गई। मुज़फ्फर की सेना अहमदाबाद की ओर भागी, पर सांगा ने पीछा किया और शहर से 20 मील दूर रुके। उन्होंने शाही खजाना लूटा, और उन मंदिरो का निर्माण फिर से करवाया जिन्हें मुघलो ने ढहा कर मस्जिदे बनाई थी। इस विजय के साथ ही पूरा उत्तरी गुजरात उनके अधीन आया, एक वफादार जागीरदार द्वारा शासित यह हिस्सा भी संपदा स्वरूप मेवाड़ के खजाने का वरदान बनी। गुजरात सल्तनत भले ही पूर्ण रूप से नष्ट न हुई, लेकिन अपमानित हुई और उनकी सीमाओं और गौरव को ठेस जरुर पहुँची।
शक्ति का शिखर
1520 तक, राणा सांगा और मेवाड़ निरंतर जित के साथ अपने सैन्य वैभव के चरम पर थे। खतौली और धौलपुर ने दिल्ली की आत्मा को चकनाचूर कर दिया था, गागरोन ने मालवा को झुकाया और इडर ने गुजरात को अधीन किया। उनका साम्राज्य आधुनिक राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश के हिस्सों तक फैला हुआ था जिसका क्षेत्रफल प्रतिहार राजाओं के बाद का सबसे बड़ा प्रभुत्व बन चूका था। उन्होंने सौ से अधिक युद्ध लड़े, जिसमे झड़पें और घेराबंदियाँ इतनी कि गिनती असंभव थी। सांगा द्वारा लड़े गए हर युद्ध ने उनकी विजय गथाओ को सजाया और बढ़ाया। उनके शरीर ने बहुत सहा: एक आँख गई, एक हाथ कटा, एक पैर अपंग हुआ और अनगिनत चोट के निशान शरीर पर उभरे। फिर भी, वे हर युद्ध में आगे रहे, उनकी उपस्थिति विद्रोह का ध्वज बनकर रही और उनकी एक आँख विजय का अडिग वचन।
सांगा की विजय केवल जीत नहीं थीं, वे एक साकार दृष्टि का प्रतिनिधित्व करती थीं। उन्होंने राजपूताने में कमजोर हो रहे राजपूत प्रभुत्व को पुनर्जनम दिया, सदी के विभाजन के बाद कबीलों को एकजुट किया, विदेशी शासन से मुक्त हिंदुस्तान को वापस लिया। मुगल इतिहासकार बदायुनी ने उन्हें राजपूतों में सबसे वीर कहा, एक अर्थ में पृथ्वीराज चौहान का समकक्ष माना। महाराणा सांगा ने एक अर्थ में अपने दादा महाराणा कुंभा की बराबरी का शौर्य और साहस सिद्ध कर लिया था। लेकिन उनकी साहस गाथाये आगे भी लिखी गई। बाबर, जो जल्द उनका सबसे बड़ा शत्रु बना उसने भी अपनी किताब ‘बाबरनामा’ में उनकी महानता लिखी, उन्हें भारत का सबसे शक्तिशाली शासक भी बताया। राणा की सेना अब सहयोगियों और जागीरदारों से भरी थी और इसकी संख्या हज़ारों में थी, एक ऐसी ताकत जो सुल्तानों और राजाओं में भय जगाती थी। साथ ही उनकी उदारता में महमूद खिलजी को छोड़ना, पराजित शत्रुओं को सम्मान देना सामिल थी। इसी उदारता ने उन्हें सामान्य सरदार से ऊपर उठाकर धर्म का राजा बनाया। उन्हें इतिहास में महाराणा हिंदूपति भी कहा गया।
लेकिन कोई दिन निरंतर नहीं रहेता और विश्वासघात अधिक समय तक टलता नहीं है। शक्ति, सामर्थ्य और स्वाभिमान से घिरे मेवाड़ की क्षितिज पर अंधेरा छा रहा था। 1526 में, उत्तर-पश्चिम से एक नया दुश्मन उतरा – जिसका नाम था बाबर। बाबर तैमुर वंश का वह क्रूर राजा तजा जिसकी महत्वाकांक्षाओं को अधिक विनाशक बनाती थी तोपों की उपलब्धि। बाबर के रूप में महाराणा सांगा की सबसे बड़ी परीक्षा सामने थी। एक ऐसा संघर्ष, जो राजपूत वीरता को मुगल नवाचार से टकराएगा। खतौली, धौलपुर, गागरोन और इडर की जीत ने एक साम्राज्य बनाया था, पर खानवा इसका भाग्य तय करने की पुष्ठभूमि बनने वाला था। अभी के लिए, राणा सांगा ही सर्वोच्च थे जो मेवाड़ की स्वाभिमानी तलवार स्वरूप, एक योद्धा जिसकी विजय ने राजपूताना के आकाश को हज़ार सूर्यों-सा रोशन किया।
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