कुंभलगढ़ : शौर्य और स्वाभिमान का उदय
जहाँ अरावली की पहाड़ियाँ मूक प्रहरी की भाँति अडिग और अचल खड़ी हैं, और रेगिस्तान की रेत सूरज की तपिश में चमकती है, उसी राजस्थान के हृदय में एक ऐसी भूमि बसी है, जो रक्त रंजित शौर्यगाथा और गौरव की गर्जना से सजी हुई है — यह भूमि है मेवाड़ की। इसी मेवाड़ की पावन धरती पर, चित्तौड़ के अभेद्य किले में एक बालक ने जन्म लिया, जो बड़ा होकर भारत के सबसे पराक्रमी योद्धाओं में से एक बना। मेवाड़ का वह राजा, जिसका नाम युगों-युगों तक लोहे की ठनक की तरह सुवर्ण इतिहास की हर लिखावट में गूँजता रहेगा। उस महान योद्धा का नाम संग्राम सिंह था, लेकिन उन्हें इतिहास में महाराणा सांगा के नाम से अमर किया। मेवाड़ का यह शेर, एक ऐसा शासक था, जिसका जीवन साहस, बलिदान और 16वीं सदी के भारत में अपने लोगों को विजय के तूफानों से बचाने की अटूट इच्छाशक्ति का प्रतीक बना। यह है उनकी स्वाभिमान गाथा में शुरुआत की कहानी – एक सशक्त और बाहुबल से लबालब बालक की गाथा, जिसे नियति ने गढ़ा, संघर्ष ने तराशा और गौरव के मुकुट से उसे नवाज़ा गया। महाराणा सांगा की गाथा एक ऐसी सुबह की दास्ताँ है, जिसने एक योद्धा राजा के सलग्न, सम्मिलित और एकत्र राजपूताने के उदय की नींव रखी।
सन् 1482 था, हालाँकि सही तारीख विद्वानों के बीच अक्सर विवाद का विषय बनी रही, क्योंकि समय की धुंध और अभिलेखों की कमी ने इसे अधिक रहस्यमयी बना दिया। यही कारण हे की आधुनिक युग में कुछ मूर्खो ने अत्र विचित्र कहानियो को आधारहीन भी गढ़ दिया। लेकिन खोजने वालो के लिए ढूँढना इतना मुश्किल नहीं रहा। कुंभलगढ़ का शिलालेख, मेवाड़ के गौरव का प्राचीन साक्षी, तारों के शुभ संयोग की ओर इशारा करता है, जिसने उनके जन्म को चिह्नित किया। उनका जन्म वह दिव्य संकेत था, जो महानता का वादा अपने होने में ही संजोये हुए था। संग्राम सिंह का जन्म सिसोदिया राजवंश के 49वें शासक राणा रायमल और हलवद के झाला वंश की राजकुमारी रतन कुंवर के यहाँ हुआ। उनकी माँ का वंश गुजरात के राजपूतों की अदम्य युद्ध-भावना का वाहक था। सिसोदिया कोई साधारण कुल नहीं था—वे अपने वंश को सूर्य से जोड़ते थे, अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं की विरासत का दावा करते थे, एक ऐसी परंपरा, जिसने उन्हें कर्तव्य की पवित्र भावना से ओतप्रोत किया। उनकी राजधानी चित्तौड़, महज़ एक किला नहीं थी; यह राजपूत प्रतिरोध का प्रतीक थी, जिसकी ऊँची दीवारें मैदानों से उठकर आकाश को चुनौती देती थीं। राणा संग्राम सिंह, राणा रायमल सिंह के तीसरे पुत्र थे और महाराणा कुम्भा के पौत्र थे। लेकिन जन्म का वह स्थान उन्हें अपने बड़े भाइयों – पृथ्वीराज और जगमल के बाद उत्तराधिकार की कतार में पीछे रखता था। शाही दरबार में, जहाँ सिंहासन एक सम्मान के साथ-साथ बोझ भी था, इस जन्म-क्रम ने उन्हें गुमनामी की ओर धकेल दिया था। अगर उनका व्यक्तिव असामान्य न होता तो मेवाड़ के इतिहास में वे शायद एक छोटी-सी टीका बनकर रह जाते, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और लिख रखा था।
बचपन से ही संग्राम सिंह में एक अलग तेज था। दरबारी फुसफुसाते थे कि यह बालक मानो युद्ध के लिए ही जन्मा हो। उसके छोटे-छोटे हाथ लकड़ी की तलवार को इस दृढ़ता से थामते थे कि उनकी उम्र का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। उनकी आँखें, जिनमें से एक जल्द ही खो जाने वाली थी वह रेगिस्तान के सूरज सी चमकती थीं। अपने दादा, राणा कुंभा की कहानियाँ, जो एक योद्धा-राजा थे, उनके कानों में लोरियों की तरह गूँजती थीं। महाराणा कुंभा ने कुंभलगढ़ जैसे अभेद्य किलों से मेवाड़ को मजबूत किया था और कविता व स्थापत्य से इसकी संस्कृति को समृद्ध किया था। उनकी मालवा और गुजरात के सुल्तानों पर विजय की गाथाएँ संग्राम के लिए महज़ इतिहास नहीं थीं – वे एक चुनौती थीं, एक विरासत, जिसे उन्हें संभालना था।
लेकिन जिस स्थिति और समय काल में वे जन्मे, वह शांत समयचक्र तो बिलकुल नहीं था। 15वीं सदी के अंत तक आते आते उत्तर भारत अशांति के भँवर में फंस चूका था। सैयद वंश और उसके बाद लोदी वंश की कमज़ोर पकड़ वाली दिल्ली सल्तनत राजपूत राज्यों पर लालची नज़र टिकाए रखती थी। वही पश्चिम में गुजरात सल्तनत भी अधीर थी, इसके शासक अपने प्रभुत्व को बढ़ाने को आतुर हो रहे थे। दक्षिण में मालवा सल्तनत महत्वाकांक्षा से उबल रही थी, इसकी सीमाएँ मेवाड़ से सटी हुई थीं। चित्तौड़, शत्रुओं के समुद्र में एक विद्रोही द्वीप सा खड़ा था। यहाँ के शासक एक अटल नियम से बँधे हुए थे —हर चुनौती का जवाब लोहे और खून से देना। सिसोदिया साम्राज्य के लिए पीछे हटना असंभव था; क्योंकि राजपूत के लिए अपमान से मृत्यु भली थी। जौहर की लपटें, उनकी स्त्रियों का आत्मदाह, उनके दृढ संकल्प का मूक साक्ष्य थीं। महाराणा संग्राम इसी कठोर परिवेश में ही बड़े हुए थे। तलवारों की झनकार और योद्धाओं की चीत्कार उनके लिए उतने ही परिचित थे, जितने महल में गूँजते कवियों के गीत।
उनका बचपन उस तरह ऐशो-आराम में नहीं बीता, जितना आम तौर पर एक राजा के पुत्र के रूप में बीतना चाहिए। राजपूत परंपरा के अनुसार, राजकुमारों को चलते ही योद्धा बनने का प्रशिक्षण शुरू हो जाता था। मेवाड़ में रहकर कुमार संग्राम भी इससे अछूते नहीं रहे। अनुभवी सेनानियों के मार्गदर्शन में उन्होंने तलवारबाज़ी, भाला-प्रहार और घुड़सवारी में महारत हासिल कर ली। मेवाड़ की रेतीली धरती उनका प्रशिक्षण स्थल बनी, जहाँ उन्होंने अपने शरीर और मन को प्रकृति की कठोरता के खिलाफ़ ढाला। घोड़ों पर उनकी सवारी स्वाभाविक थी; उनका दुबला-पतला शरीर उस शक्ति को छिपाए था, जो एक दिन दोगुने बड़े शत्रुओं को धूल चटा देने को समर्थ था। कवियों ने उनके शुरुआती कारनामों को गीतों में ढाला—कैसे एक बालक के रूप में उन्होंने शिकार में जंगली सूअर को धराशायी किया, उनके हाथ खून से रँगे, और उनकी हँसी साथियों के जयघोष में गूँजती रही। ये कथाएँ, भले ही समय के साथ अलंकृत हुई हों, लेकिन यह आज भी एक ऐसे राजकुमार की छवि रचती हैं, जो खतरों के बीच भी अडिग रहता था।
किंतु खतरा केवल बाहर से नहीं था, यह चित्तौड़ की दीवारों के भीतर भी साँस लेता था। सिसोदिया दरबार षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ था, जहाँ महत्वाकांक्षा और निष्ठा के बीच खूनी खेल चलते रहते थे। कुमार संग्राम के पिता राणा रायमल का शासन पारिवारिक कलह से भरा था, जो राणा कुंभा की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के विवादों से उपजा था। कुमार संग्राम के बड़े भाई पृथ्वीराज स्पष्ट उत्तराधिकारी थे – जो एक उग्र योद्धा के स्वरूप में जाने गए थे, जिनका क्रोध उनकी तलवार से मेल खाता था। मझले भाई कुमार जगमल अपनी महत्वाकांक्षाओं को पाले बैठे थे, उनकी ईर्ष्या एक शांत ज़हर की तरह कार्य करती थी। कुमार संग्राम इस भाई-भतीजावाद के जाल में फँसे हुए थे, उनकी स्थिति राज्य साशन में अनिश्चित रही किंतु संघर्ष में निर्णायक थी। शायद शिकार में कोई चूक या युद्ध में कोई त्रासदी, ऐसे ही एक पल में मेवाड़ की राजनीती में मानो एक विपदा आई। भाई या किसी करीबी के हाथ से चली तलवार ने निशाना साधा, और कुमार संग्राम की बायीं आँख हमेशा के लिए खो गई। यह घाव उनके जीवन का पहला निशान बन गया था, जो हिंसा का प्रतीक बन गया जो उनकी नियति को रंग देनेवाला था। फिर भी, उन्होंने इस घांव को भी उस सहनशीलता से झेला कि लोग दंग रह गए। जहाँ कोई और डगमगा जाता, वे और मज़बूत हुए। उनकी एक आँख वाली नज़र उनके अटूट संकल्प का प्रतीक बन कर रह गई।
यह पहला घाव था, पर अंतिम नहीं। किशोरावस्था में कदम रखते ही कुमार संग्राम का युद्ध-कौशल मेवाड़ में चर्चा का विषय बन गया। वे समय समय पर अपने पिता के अभियानों में भी पड़ोसी सरदारों और अतिक्रमणकारी सुल्तानों के खिलाफ़ शामिल हुए । हर लड़ाई उनकी किंवदंती में एक नया अध्याय जोड़ती गई। उनका शरीर और साशन युद्ध का चित्रपट बनता चला गया, जिसमे तलवारों के घाव, तीरों के निशान और लगने वाली हर चोट सम्मान का पदक बन रही थी। राजपूत संहिता कहती थी कि योद्धा आगे से नेतृत्व करे, और कुमार संग्राम ने इसे पूरे मन से अपनाया हुआ था। वे अभी राणा नहीं बने थे, पर पहले से ही एक नेता के रूप में उभर कर आये थे। जब उम्मीद टूटती थी, उनकी आवाज़ लोगों को जोड़ती थी; उनकी मौजूदगी निराशा के खिलाफ़ ढाल बन जाती थी। कवियों ने उनके नाम को गीतों में पिरोया और शौर्य गीतों का निर्माण भी प्रारंभ हुआ जिनके शब्द बने – “संग्राम,” युद्ध का अवतार।
लेकिन जीवन इतना आसान नहीं रहा, सन् 1508 या 1509 में राणा रायमल की मृत्यु ने मेवाड़ को अराजकता में डुबो दिया। सिंहासन, शक्ति और संकट का केंद्र रहने वाला मेवाड़ खून और विश्वासघात से सना पुरस्कार बन गया। बड़े भाई पृथ्वीराज ने पहले दावा कर दिया, उनकी उग्र आत्मा ने विजयी शासन का वादा किया। किंतु उनका राज अल्पकालिक रहा। राजपूत इतिहास की काली गाथाओं की तरह, एक विश्वासघात ने उन्हें जहर दे दिया—उनके बहनोई के हाथों, जिसका नाम शर्म के कारण गुमनाम हो गया। जगमल आगे बढ़े, उनकी महत्वाकांक्षा उजागर हुई, पर उनका दावा कमज़ोर था, समर्थन डगमगा रहा था। दरबार बिखर गया, गुट बन गए, और मेवाड़ गृहयुद्ध के किनारे पर पहुँच गया। इस भँवर से संग्राम सिंह न हड़पने वाले, बल्कि उद्धारक बनकर उभरे। उनके भाइयों की मृत्यु, चाहे भाग्य से या अंतर युद्ध या षड्यंत्रों ने रास्ता साफ़ किया, पर उनकी अपनी योग्यता ने उन्हें मेवाड़ का शासन दिलाया। संघर्ष से थके मेवाड़ के सरदारों ने उनमें एक अजेय योद्धा और उद्धारक पुरुष देखा, जो उन्हें एकजुट कर सके। मेवाड़ का वह राणा, जो आने वाले तूफानों से उनके अस्तित्व और सम्मान की रक्षा करे। सन् 1509 में राणा संग्राम सिंह, महाराणा सांगा के रूप में मेवाड़ के 50वें शासक बने। वे अब तीसरे पुत्र नहीं रहे, न एक आँख वाला बालक, वे अब मेवाड़ की शान थे जो महाराणा थे, एक ऐसी उपाधि जो सदी का भार लिए थी।
सिर्फ 27 वर्ष की आयु में, वे अपने घावों के बावजूद ऊँचे खड़े थे। उनके चौड़े कंधों ने षड्यंत्र और शत्रुओं से घिरे राज्य का कार्य भार और शासन संभाला। उनका राज्याभिषेक चित्तौड़ की दीवारों के भीतर एक गंभीर समारोह था, लेकिन मंत्रों के बीच तलवारों की ठनक गूँज उठी। जो मुकुट उन्होंने पहना, वह सोने का नहीं, एक संकल्प से भरा था। वह संकल्प था किसी भी कीमत पर मेवाड़ की रक्षा का वचन। जब वे प्राचीर से क्षितिज को निहारते थे, उनकी एक आँख न केवल अपने पूर्वजों की धरती देख रही थी, बल्कि उस भविष्य को भी जिसे वे आगे चलकर गढ़ने वाले थे। उनके शासन की वह सुबह शुरू हुई, जीसके साथ एक ऐसे योद्धा का उदय हुआ, जिसका नाम आनेवाले समय में पुरे भारत भर में गूँजेगा।
यह तो बस शुरुआत थी। सुल्तानों, आक्रमणकारियों और यहाँ तक कि मित्रों के खिलाफ़ उनकी लड़ाइयाँ उनकी हिम्मत की ऐसी परीक्षा लेंगी, जिसकी कल्पना भी असंभव थी। उनका शरीर टूटेगा, उनके सपने डगमगाएँगे, पर उनकी आत्मा अडिग रहेगी। एक ऐसी ज्वाला, जिसे कोई शत्रु बुझा न सकेगा। यह थे राणा सांगा, मेवाड़ के शेर, और उनकी गाथा अभी सिर्फ शुरू हुई थी।
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