शाश्वत ज्वाला: विरासत और उससे आगे


शाश्वत ज्वाला: विरासत और उससे आगे

1527 में खानवा में महाराणा सांगा का पराजय एक ऐसा आघात था, जिसने राजपूताने के एकत्रीकरण के संकल्प को भीतर तक झकझोर दिया। खानवा की हार एक सामान्य हार नहीं थी, वह हार थी जिसने उनके एकजुट हिंदू साम्राज्य के स्वप्न को चूर-चूर कर दिया और मेवाड़ को बाबर की विजय की छाया में छोड़ दिया। 1528 में उनकी मृत्यु एक सशक्त, सामर्थ्य और एकत्र राजपूताने के संकल्प युग का अंत थी। उनकी मृत्यु चाहे जहर से हुई हो या युद्ध से थके शरीर के समर्पण से लेकिन उनका देह त्याग एक ऐसे महापुरुष का युद्ध मैदान से विदा होने की घटना थी, जिसने दो दशकों तक अपना प्रभुत्व बनाए रखा। फिर भी, राणा सांगा की गाथा उनकी अंतिम साँस के साथ खत्म नहीं हुई। मरते अंगारे से उठने वाली ज्वाला-सी उनकी विरासत मेवाड़ के खून में निरंतर धधकती रही, उनके उत्तराधिकारियों के हृदय को प्रज्वलित करती रही और उनका नाम भारत की आत्मा में अंकित करती रही। लेकिन यह उसके बाद की कहानी है – उस शासन के लिए, जिसने मेवाड़ को संभाले रखा। उनके पुत्र जिन्होंने उनका खून भी इसी संघर्ष में बहाया; और वह पौत्र, जिसने मुगलों के खिलाफ उनकी मशाल को बेख़ौफ़ होकर थामे रखी। यह एक ऐसे राजा की कहानी है, जिसकी आत्मा सतको के लिए स्वाभिमान की शाश्वत ज्वाला बन गई। वीरता और अवज्ञा की वह किरण, जिसे न समय बुझा सका और न ही मृत्यु।

नुकसान की छाया

1528 में सांगा की रहस्यमयी तरीके से हुई मृत्यु ने मेवाड़ को अनिश्चितता के गर्त में धकेल दिया। वे कालपी में मरे, या शायद कहीं और, जैसा कि विवरणों में भिन्नता है। उनके शव को गंभीर जुलूस के साथ चित्तौड़ लौटाया गया था, जब उनकी एकमात्र आँख हमेशा के लिए बंद हो गई। कवियों ने उनके जाने पर शोक और गर्व के मिश्रित स्वर में गीत गाए, उनकी काँपती आवाजें उनके घावों, उनकी विजयों और दिल्ली को पुनः प्राप्त करने की उनकी अधूरी शपथ का बखान करती थीं। दरबार ने न केवल एक राजा का शोक मनाया, बल्कि एक ऐसे विजेता का भी, जिसकी मौजूदगी ने कई कबीलों के गठजोड़ को एकसूत्र में बाँधे रखा था। एकता का सपना संजोये रखा, जो अब बिखरने की कगार पर था। लेकिन उसके बाद भी आगरा में सुरक्षित बाबर ने इस कमजोरी का लाभ नहीं उठाया, मेवाड़ तब रानी कर्णावती के संरक्षण में था। लेकिन बाबर का युद्ध न करना शायद मेवाड़ की शेष शक्ति से सतर्कता था, शायद खानवा के सबक से संतुष्ट होने का प्रमाण था। फिर भी राणा सांगा के बाद मेवाड़ पर मुगलों का खतरा मँडरा रहा था, मानो क्षितिज पर एक तूफान बनकर कुछ उभर रहा था।

सिंहासन सांगा के सबसे बड़े पुत्र रतन सिंह द्वितीय को मिला, जो मुश्किल से उस वक्त 20 वर्ष का था और रानी कर्णावती का बेटा था। उन्हें एक ऐसा राज्य विरासत में मिला, जो हार से जर्जर था और इसकी सीमाएँ भी कमजोर थी। मेवाड़ ने राणा सांगा को अभी अभी खोया था, परिणाम स्वरूप मेवाड़ के सहयोगी भी डगमगाए हुए थे। क्योंकि रतन सिंह अपने पिता की विशाल छाया से मेल नहीं खा सके और उनका शासन, 1528 से 1531 तक संक्षिप्त और संकटग्रस्त रहा। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने कमजोरी को भाँपकर मेवाड़ के पश्चिमी हिस्सों पर हमला बोला, जिससे मेवाड़ मुश्किलों से अधिक घिर गया। उसी मौके का फायदा उठाकर मेवाड़ में बनबीर जैसे रईसों में जो आंतरिक असंतोष से उबल रहा था उसको एक दिशा मिल गई। बनबिर एक सिसोदिया रिश्तेदार और सरदार थे, जिसकी महत्वाकांक्षा तख़्त पाने के लिए भड़क रही थी। रतन सिंह की मृत्यु 1531 में हुई, जिसके लिए कुछ कहते हैं युद्ध में, कुछ कहते हैं विश्वासघात से हुई लेकिन उन्होंने कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा था। उनका संक्षिप्त शासन राणा सांगा की प्रतिभा की क्षणिक परछाईं मात्र बनकर रह गया था।

रतन सिंह की मृत्यु के बाद ताज राणा सांगा के दूसरे पुत्र विक्रमादित्य को मिला, जो तब 12 या 13 साल के था। उसकी अल्पायु को एक संरक्षक की जरूरत थी, इसके लिए रानी कर्णावती आगे आईं। रानी कर्णावती मेवाड़ की वह रानी, जिसकी ताकत अपने पति के संकल्प की गूँज थी। कर्णावती केवल पत्नी नहीं थीं – वे सांगा की आजीवन सहचरी रही थीं, उनकी सलाह ने उनके शासन को आकार दिया था और उनके हारा रक्त ने इसे दृढ़ता भी प्रदान की थी। 1531 से 1535 तक संरक्षक के रूप में, उन्होंने मेवाड़ को अटल इच्छाशक्ति से एकजुट रखा। रानी कर्णावती ने इस समय के दौरान कुलीनों को एकसाथ बाँधा, चित्तौड़ को मजबूत किया और गुजरात के आक्रमणों को भी रोका। कर्णावती का शासन एक सेतु के समान था, जिसके द्वारा राणा सांगा की विरासत को तब तक बचाए रखने का हताश प्रयास था जब तक उनके बेटे परिपक्व न हो जाएँ। फिर भी, भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया और एक बार फिर मेवाड़ पर क्रूर प्रहार हुआ। 1535 में बहादुर शाह ने चित्तौड़ की घेराबंदी कर ली, मुगल सहायता से उसकी सेना बढ़ी हुई थी। सहयोगियों से कम और धोखे से घिरे मेवाड़ में, कर्णावती ने किले की महिलाओं को जौहर के लिए प्रेरित किया। जौहर का एकमात्र उद्देश्य था अपमान से बचने के लिए स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देना। जबकि पुरुष साका में मृत्यु की ओर बढ़े चल पड़े, जो मेवाड़ में राजपूत गौरव का अंतिम संग्राम माध्यम था। विक्रमादित्य इस तबाही से बच गए, पर उनका शासन कमजोर रहा। उसी कमजोर मेवाड़ी शासन में सन 1536 को बनबीर ने सत्ता हथियाने के लिए उनकी हत्या कर सिंहासन पर कब्जा कर लिया।

इस अराजकता के बीच सांगा के तीसरे पुत्र उदय सिंह द्वितीय उभरे, जो उनके पिता की आत्मा के सच्चे वारिस माने जाते है। राणा सांगा की विजयों के बीच 1522 में जन्मे उदय सिंह खानवा के दौरान एक शिशु थे, चित्तौड़ के पतन के बाद वह निर्वासन में पले। बनबीर के विश्वासघात ने उन्हें भागने पर मजबूर किया, जहाँ सादरी के झाला सरदार जैसे वफादारों ने उन्हें शरण दी। 1540 में, 18 साल की उम्र में, उदय ने अपनी धाय माँ पन्ना दाई की मदद से मेवाड़ पुनः हासिल किया। पन्ना धाई का बलिदान भी मेवाड़ पर एक उपकार समान था, क्योंकि उसी क्षत्राणी ने राणा उदय सिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र की बलि दे दी। पन्ना ढाई की गाथा एक ऐसी निष्ठा की कहानी है, जो राणा सांगा के अपने जागीरदारों से रिश्ते की मजबूती का प्रमाण थी। उदय सिंह का शासन संघर्षों से भरा रहा, वे अधिक दिन चित्तोड़ नहीं संभाल पाए और उन्होंने 1568 में चित्तौड़ को अकबर के आक्रमणों से खोया। लेकिन पिता की ही भांति उन्होंने हार नहीं मणि और उदयपुर की नींव रखी, जो सिसोदिया गौरव का नया गढ़ बना। उनके बाद उनके पुत्र महाराणा प्रताप, जो 1540 में जन्मे और राणा सांगा की अवज्ञा के मशालवाहक बने। प्रताप एक योद्धा, जिसका 1576 में हल्दीघाटी का पराक्रम उनके दादा की अटल इच्छा शक्ति का प्रतिबिंब था।

ज्वाला आगे बढ़ी

महाराणा सांगा की विरासत महाराणा प्रताप में सबसे सशक्त रूप से जीवित थी। एक पौत्र, जिसे वे कभी नहीं जान या देख सके लेकिन उनकी आत्मा को उनके शौर्य और साहस गथाओ ने गढ़ा। महाराणा प्रताप को न केवल राणा सांगा का रक्त मिला, बल्कि उनकी दृष्टि भी उन्ही से प्रेरित थी। उनका लक्ष्य भी रहा एक ऐसा राजपूताना घड़ना, जो मुगलों के जुए से मुक्त हो; एक ऐसा मेवाड़, जो आत्मसमर्पण से हर क्षण अछूता रहे। जहाँ राणा सांगा ने बाबर का सामना किया, वहीं प्रताप ने बाबर के पौत्र अकबर को दशकों तक चकते रहे युद्ध में ललकारा। हल्दीघाटी के संग्राम में महाराणा प्रताप ने वही क्रूरता दिखाई, जो राणा सांगा ने खानवा में प्रदर्शित की थी। उस युद्ध में उनके घोड़े चेतक ने शत्रुओं पर उसी तरह छलाँग लगाई, जैसे राणा सांगा ने कभी बाबर की तोपों पर धावा बोला था। हार के बावजूद महाराणा प्रताप पहाड़ियों में चले गए, लेकिन अपने दादा की ही तरह हार को नहीं स्वीकारा। जंगल में रहेते हुए उन्होंने गुरिल्ला युद्ध छेड़ा, जिसने मेवाड़ की ज्वाला को निरंतर जीवित रखा। मुघल साम्राज्य के सामने झुकने के बजे एक ऐसा प्रतिरोध, जिसका राणा सांगा ने उत्साह से स्वागत किया होता। आत्मसमर्पण के बजाय जंगलों में रहने का उनका इनकार खानवा के बाद सांगा की शपथ को प्रतिबिंबित करता था – वो ही इच्छा शक्ति और अंत तक लड़ने की प्रतिज्ञा।

महाराणा प्रताप और राणा सांगा के बिच रक्त सहित अनेक समानताएँ गहराइ से जुडी हुई थीं। राणा सांगा का गठजोड़ खानवा में टूटा था, लेकिन उसी चिंगारी ने महाराणा प्रताप के राठौड़ों और भीलों के साथ गठबंधन को प्रज्वलित किया। राणा सांगा की वीरता और महमूद खिलजी को क्षमा करना भी महाराणा प्रताप के सम्मान में गूँजी, जिन्होंने दया माँगने वाले शत्रुओं को बख्शा और जीवन दान दिया। दोनों के शरीर पर घाव थे चाहे वह राणा सांगा के देह पर हो या राणा प्रताप के फिर भी दोनों ने ही हार नहीं मानी। इतिहासकार प्रताप को सांगा के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानते हैं, जो बाबर की बंदूकों और तोप से छीने गए राणा सांगा के सपने को पूरा करने का दूसरा अवसर। जहाँ सांगा एक नए युग के हाथों गिरे, वहीं प्रताप ने खुद को ढाला। उनकी विरासत मेवाड़ की आत्मा में राणा सांगा द्वारा डाले गए लचीलेपन का प्रमाण थी।

पत्थर और गीत में विरासत

राणा सांगा का प्रभाव उनके वंश से कहीं आगे तक फैला, जिसने राजपूताने की पहचान और भारत के ऐतिहासिक ताने-बाने को आकार दिया। उनके शासन में मेवाड़ के किले चित्तौड़, कुंभलगढ़ और गागरोन सामर्थ्य के प्रतीक बने, उनकी दीवारें उनके दादा कुंभा की दृष्टि और उनकी अपनी विजयों की गवाह थीं। उन्होंने इस विरासत को समृद्ध किया—आक्रमणकारियों द्वारा ध्वस्त मंदिरों को पुनर्जनन दिया, गुजरात और मालवा में नए मंदिर बनवाए गए जो उनके सैन्य पराक्रम का सांस्कृतिक जवाब थे। कवियों को उनके संरक्षण ने सुनिश्चित किया कि उनके कर्म गीतों में जीवित रहें – ‘राणा सांगा गाथा’ जैसे काव्यों में उनके घावों, उनकी जीतों, उनके पतन को गाया गया, उन्हें राजपूत लोकाचार के सम्मान और बलिदान में पिरोया गया।

भारतीय इतिहास के विस्तृत पटल में, खानवा में सांगा का रुख एक निर्णायक मोड़ था। बाबर की जीत ने मुगल प्रभुत्व को पक्का किया (एक वंश, जो 1857 तक राज करेगा) फिर भी सांगा के प्रतिरोध ने अवज्ञा के बीज बोए, जो बाद के विद्रोहों में खिले। सतीश चंद्र जैसे इतिहासकार मानते हैं कि सांगा के गठजोड़ के बिना बाबर का साम्राज्य भी नहीं डगमगा सकता था, लेकिन खानवा वह निहाई थी, जिस पर मुगल शक्ति गढ़ी गई। यदि सिलहाड़ी डटा रहता, यदि तोपें चुप हो जातीं, तो सांगा दिल्ली पर कब्जा कर लेते, और भारत की नियति बदल जाती। इसके बजाय, उनकी हार एक शानदार त्रासदी बन चुकी थी – एक क्षण, जब राजपूत वीरता एक अजेय ज्वार के खिलाफ सबसे तेज चमकी।

लोक स्मृति में राणा सांगा एक नायक के रूप में जीवित हैं। 1980 के दशक की टीवी श्रृंखला ‘भारत एक खोज’ ने उन्हें एक दृढ़ योद्धा के रूप में चित्रित किया। रवि झनकल के मजबूत अभिनय ने उनकी शांत शक्ति को उजागर किया। ‘भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप’ में आरव चौधरी ने एक विशाल सांगा को जीवंत किया, उनकी एक आँख की चमक अटल इच्छाशक्ति का प्रतीक थी। ये चित्रण, भले ही नाटकीय हों, एक सत्य को प्रतिबिंबित करते हैं। राणा सांगा जीवन से बड़े थे, एक राजा, जिसकी कहानी आज भी राजपूत खून में उबाल लाती है। राजस्थान में उनका नाम स्कूलों, सड़कों और दादियों की कहानियों में गूँजता है। महाराणा सांगा, वह शेर था जिसने तूफान के खिलाफ भी बेख़ौफ़ दहाड़ लगाई।

शाश्वत ज्वाला

राणा सांगा की विरासत उनकी जीतों में ही नहीं बल्कि उनके पीछे छोड़ी भावना में है। क्योंकि जित के आंकड़े गिनती तक में नहीं आते, छोटे मोटे संघर्ष तो १०० से अधिक हुए थे। उन्होंने सदियों के बिखराव के बाद राजपूताने को एकजुट किया, जो दिल्ली के आधिपति और सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बाद राजपूतो की एक बेजोड़ उपलब्धि थी। युद्ध से जर्जर उनका शरीर धीरज का स्मारक बन गया, एक राजा जिसने खुद को अपने उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया। उनकी वीरता, उनका विश्वास, एक स्वतंत्र हिंदुस्तान का उनका सपना उन्हें एक शासक से आगे एक शौर्य और सामर्थ्य के प्रतीक तक ले गया। खानवा ने उन्हें गिराया हो सकता है, पर मिटा न सका। उनकी ज्वाला रानी कर्णावती, राणा उदय सिंह और महाराणा प्रताप तक पहुँची। मेवाड़ बना एक अवज्ञाकारी वंशावली, जिसने बड़े बड़े बादशाहों और साम्राज्यों को ललकारा।

चित्तौड़ के खंडहरों की शांति में या उदयपुर की गलियों की चहल-पहल में, राणा सांगा की मौजूदगी बनी रहती है। कवि आज भी उनके बारे में गाते हैं, उनकी आवाज रेगिस्तान की रेत पर उनका नाम ले जाती है: “सांगा, अखंड तलवार, मेवाड़ का शेर।” उनकी विरासत साहस का आह्वान है और यह याद दिलाती है कि हार में भी, एक इंसान राजाओं से ऊँचा खड़ा हो सकता है। वे राजपूताने की शाश्वत ज्योति थे। एक रोशनी, जो समय के साथ जलती रहती है; एक योद्धा, जिसकी महानता भारतीय इतिहास में उन सभी के लिए प्रकाश-स्तंभ बनी हुई है, जो आत्मसमर्पण से अधिक सम्मान को महत्त्व देते हैं।


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